🕉️ घर में मूर्ति स्थापना या मंदिर बनाने के लिए कौन सी तारीख शुभ है?
Murti Sthapana Muhurat • वास्तविक ग्रह-स्थितियों से गणना
मूर्ति या गृह-मंदिर की स्थापना स्थिर नक्षत्र में करें — रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद — या पुष्य, अनुराधा, श्रवण, रेवती में; शुभ तिथि या पूर्णिमा पर, पंचक-भद्रा से बाहर। मंदिर घर के ईशान में, उपासक का मुख पूर्व या उत्तर।
आगामी शुभ तिथियाँ (अगले 60 दिन)
सामान्य पंचांग के अनुसार — आपकी व्यक्तिगत परत से पहले। नीचे राशि चुनें, ताकि जो दिन विशेषतः आपके लिए अनुकूल नहीं हैं वे हट जाएँ।
| तारीख | तिथि | नक्षत्र | तिथि समाप्ति |
|---|---|---|---|
| शनि, 25 जुल॰ | Shukla Ekadashi | Jyeshtha | 11:36 |
| गुरु, 30 जुल॰ | Krishna Pratipada | Shravana | 21:32 |
| शनि, 8 अग॰ | Krishna Dashami | Rohini | 14:00 |
| शुक्र, 14 अग॰ | Shukla Dwitiya | Purva Phalguni | 18:48 |
| शनि, 15 अग॰ | Shukla Tritiya | Uttara Phalguni | 17:30 |
| शनि, 22 अग॰ | Shukla Dashami | Jyeshtha | 02:02+1d |
| मंगल, 25 अग॰ | Shukla Dwadashi | Uttara Ashadha | 06:22 |
| मंगल, 22 सित॰ | Shukla Ekadashi | Uttara Ashadha | 21:45 |
🎯 इस कार्य के लिए आपकी व्यक्तिगत तिथियाँ
अपनी राशि (चंद्र राशि) चुनें — हम आपके चंद्राष्टम के दिन हटाकर शेष को क्रम देते हैं। राशि नहीं पता? अपनी राशि और नक्षत्र जानें →
यह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है
स्थापना का अर्थ ही स्थिर करना है — स्थायित्व ही प्रयोजन — अतः नींव की तरह यहाँ भी स्थिर नक्षत्र प्रधान हैं। प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति के लिए प्राण-प्रतिष्ठा ही मुहर है; साधारण गृह-मंदिर के लिए स्थापित छवि के आगे पहला दीपक वही कोमल समकक्ष है। दिशा यहाँ असामान्य भार रखती है: ईशान कोण मंदिर का घर है; देव-विशिष्ट वार चुनाव और सँवारते हैं — गणेश हेतु बुधवार या चतुर्थी, शिव सोमवार, देवी शुक्रवार, विष्णु-रूप गुरुवार।
पर्व-स्थापनाएँ (गणेश चतुर्थी की मूर्ति, नवरात्रि का घट) अपनी पूर्ण स्वीकृति स्वयं रखती हैं — आगे कोई जाँच नहीं। शेष सभी दिनों के लिए नीचे का कैलेंडर पूर्ण संस्कार-नियम + आपकी व्यक्तिगत परत लगाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या चातुर्मास में गृह-मंदिर बना सकते हैं?
साधारण गृह-मंदिर और नित्य-पूजा की छवियाँ — हाँ, शुभ दिन देखकर। प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति की औपचारिक स्थापना अन्य प्रतिष्ठा-कर्मों की तरह परंपरागत रूप से चातुर्मास-पार टाली जाती है। पर्व-स्थापनाएँ (गणेश चतुर्थी पर गणपति) अपना स्वीकृत अपवाद हैं।
मंदिर का मुख किस दिशा में हो?
मंदिर यथासंभव घर के ईशान (उत्तर-पूर्व) में हो, इस प्रकार कि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व (आदर्श) या उत्तर रहे। शयनकक्ष की दक्षिण दीवार और सीढ़ी के नीचे — वास्तु के दो सबसे स्थिर निषेध — से बचें।
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