🕉️ घर में मूर्ति स्थापना या मंदिर बनाने के लिए कौन सी तारीख शुभ है?

Murti Sthapana Muhurat • वास्तविक ग्रह-स्थितियों से गणना

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मूर्ति या गृह-मंदिर की स्थापना स्थिर नक्षत्र में करें — रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद — या पुष्य, अनुराधा, श्रवण, रेवती में; शुभ तिथि या पूर्णिमा पर, पंचक-भद्रा से बाहर। मंदिर घर के ईशान में, उपासक का मुख पूर्व या उत्तर।

आगामी शुभ तिथियाँ (अगले 60 दिन)

सामान्य पंचांग के अनुसार — आपकी व्यक्तिगत परत से पहले। नीचे राशि चुनें, ताकि जो दिन विशेषतः आपके लिए अनुकूल नहीं हैं वे हट जाएँ।

तारीखतिथिनक्षत्रतिथि समाप्ति
सोम, 26 अक्टू॰Shukla PurnimaAshwini09:42
बुध, 28 अक्टू॰Krishna TritiyaKrittika01:08+1d
शुक्र, 30 अक्टू॰Krishna PanchamiMrigashira19:26
गुरु, 5 नव॰Krishna EkadashiUttara Phalguni10:37
बुध, 11 नव॰Shukla DwitiyaAnuradha15:55
सोम, 16 नव॰Shukla SaptamiShravana04:21+1d
गुरु, 3 दिस॰Krishna DashamiUttara Phalguni23:05
सोम, 14 दिस॰Shukla PanchamiShravana19:17

🎯 इस कार्य के लिए आपकी व्यक्तिगत तिथियाँ

अपनी राशि (चंद्र राशि) चुनें — हम आपके चंद्राष्टम के दिन हटाकर शेष को क्रम देते हैं। राशि नहीं पता? अपनी राशि और नक्षत्र जानें →

यह मुहूर्त कैसे निकाला जाता है

स्थापना का अर्थ ही स्थिर करना है — स्थायित्व ही प्रयोजन — अतः नींव की तरह यहाँ भी स्थिर नक्षत्र प्रधान हैं। प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति के लिए प्राण-प्रतिष्ठा ही मुहर है; साधारण गृह-मंदिर के लिए स्थापित छवि के आगे पहला दीपक वही कोमल समकक्ष है। दिशा यहाँ असामान्य भार रखती है: ईशान कोण मंदिर का घर है; देव-विशिष्ट वार चुनाव और सँवारते हैं — गणेश हेतु बुधवार या चतुर्थी, शिव सोमवार, देवी शुक्रवार, विष्णु-रूप गुरुवार।

पर्व-स्थापनाएँ (गणेश चतुर्थी की मूर्ति, नवरात्रि का घट) अपनी पूर्ण स्वीकृति स्वयं रखती हैं — आगे कोई जाँच नहीं। शेष सभी दिनों के लिए नीचे का कैलेंडर पूर्ण संस्कार-नियम + आपकी व्यक्तिगत परत लगाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या चातुर्मास में गृह-मंदिर बना सकते हैं?

साधारण गृह-मंदिर और नित्य-पूजा की छवियाँ — हाँ, शुभ दिन देखकर। प्राण-प्रतिष्ठित मूर्ति की औपचारिक स्थापना अन्य प्रतिष्ठा-कर्मों की तरह परंपरागत रूप से चातुर्मास-पार टाली जाती है। पर्व-स्थापनाएँ (गणेश चतुर्थी पर गणपति) अपना स्वीकृत अपवाद हैं।

मंदिर का मुख किस दिशा में हो?

मंदिर यथासंभव घर के ईशान (उत्तर-पूर्व) में हो, इस प्रकार कि पूजा करते समय आपका मुख पूर्व (आदर्श) या उत्तर रहे। शयनकक्ष की दक्षिण दीवार और सीढ़ी के नीचे — वास्तु के दो सबसे स्थिर निषेध — से बचें।

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